Friday, 19 December 2014

ज़ख्म / काव्यशाला an anthology

ज़ख्म।

लिबास पहन कर अपने ज़ख्मों को छुपा लिया,
फिर उन्ही लिबास ने मेरे ज़ख्मों को कुरेद दिया।

अब तो आदत सी बन गयी है ज़ख्मों को जीने की,
इसलिए दवा और दुआओं से खुद ही परहेज़ कर लिया।

अब रिस्ते खून और दर्द सिर्फ़ अपने से लगते है,
इसलिए पुराने ज़ख्मों को भी नासूर ही बना रहने दिया।

बेशकीमती से है मेरे ग़म और यह सारे ज़ख्म,
कुछ उधार मिले तो कुछ खरीद के रख लिया।

दुआएँ भी आती रही मरहम लगाने को हर वक़्त,
मैंने ही हर दुआ के बाद ख़ुद को काँटों में उलझा लिया।

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India
Complicated माहौल में simple सा बंदा हूँ। दूरियाँ तो जायज़ है फिर भी ऐसे हमेशा करीब हूँ। कुछ लिख कर, कुछ पढ़कर, सबसे कुछ सीख कर, अकेला ही सही, एक मंज़िल के लिए निकला हूँ।