Tuesday, 13 October 2015

एक सफ़र।

एक सफ़र।

निकली जो सड़क पता नहीं किस ओर की थी..
मंज़िल क्या पता, पता नहीं किस छोर की थी..

भटकते से कंकड़ उनपे कुछ निखरे थे..
और ज़िन्दगी लड़खड़ायी अचानक एक भोर सी थी..

न रास्ते ख़त्म होने थे न आगे रुकना था..
फिर भी ज़िन्दगी की नब्ज़ किसी डोर सी थी..

बढ़ते कदम को घाव और नर्म एहसास भी मिले..
लेकिन मेरे हौसले का शोर पुरे ज़ोर की थी..

वक़्त आज़माता रहा मुझे के मेरी उम्र कम थी..
और मेरी किस्मत किसी ख़ुशक़िस्मत चोर सी थी..!!

Nikali jo sadak pata nahi kis oar ki thi..
Manzil kya pata, pata nahi kis chhor ki thi..

Bhatakte se kankad unpe kuchh nikhre the..
Aur zindagi ladkhadayi achanak ek bhor si thi..

Na raaste khatm hone the na aage rukna tha..
Fir bhi zindagi ki nabz kisi dor si thi..

Badhte kadam ko ghaaw aur narm ehsaas bhi mile..
Lekin mere hausle ka shor pure zor ki thi..

Waqt aazmaata raha mujhe ke meri umra kam thi..
Aur meri kismat kisi khushkismat chor si thi..!!

#Abhilekh

About Me

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India
Complicated माहौल में simple सा बंदा हूँ। दूरियाँ तो जायज़ है फिर भी ऐसे हमेशा करीब हूँ। कुछ लिख कर, कुछ पढ़कर, सबसे कुछ सीख कर, अकेला ही सही, एक मंज़िल के लिए निकला हूँ।